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Saturday, June 18, 2011

रंग, कला और विवाद के महारथी

मकबूल फिदा हुसैन नहीं रहे। एक ऐसा शख्स जिनके ब्रश से चर्चा के रंग बिखरते थे, जिनकी रची आकृतियों में विवाद के रंग ही सजते थे। वे कला की वजह से मकबूल तो बहुत हुए मगर ना जाने कितनी और सुर्खियां उनकी बदनामी की वजह बनी। सफेद झक दाढ़ी और दमकते व्यक्तित्व के मकबूल ने कभी किसी विवाद को अपने दिल पर नहीं लिया। यही बिंदास अंदाज उनके प्रशंसकों की लंबी कतार बढ़ाता रहा और यही बेलौस फख्खड़पन उन्हें देश से दरबदर भी करता रहा। 

कभी हिन्दू देवी-देवताओं के विवादास्पद चित्र, कभी नागरिकता के लिए कतर जैसे देशों की शरण, कभी माधुरी, तब्बू और अमृता राव जैसी नामी अभिनेत्रियों के लिए अपनी पसंदगी जाहिर कर मीडिया में छा जाना, कभी फिल्म निर्माण के क्षेत्र में बिना किसी तैयारी के कूद पड़ना और कभी अपनी पेंटिग्स की आकाश छूती कीमतों के लिए मशहूर यह कलाकार 'गुमनामी के अंधेरे' से लुकाछिपी करता रहा। मीडिया से ज्यादा दिन हुसैन दूर रह ही नहीं पाते थे। 
95 वर्षीय इस खूबसूरत बुजुर्ग ने अपने पर बुढ़ापा आने ही नहीं दिया। 17 सितंबर 1915 में भारत के महाराष्ट्र राज्य के पंढरपुर में जन्में मकबूल ने अपनी अंतिम सांस लंदन में ली। उनके पारिवारिक सुत्रों ने बताया कि सुबह 2.30 मिनट पर हुसैन ने अपनी समस्त कला और विवाद दुनिया को सुपुर्द कर अंतिम यात्रा के लिए रूखसत लीं। फोर्ब्स पत्रिका ने उन्हें भारत के पिकासो के नाम से नवाजा था। वारंट, देश निकाला, संपत्ति जब्त, विरोध, अश्लीलता, धर्म का अपमान, मीडिया, एक्ट्रेस जैसे शब्द मकबूल से आजीवन जुड़े रहे। 
1940 से हुसैन की कला मुखर होने लगी और 1947 में वे प्रगतिशील कला ग्रुप( प्रोग्रेसिव आर्ट ग्रुप) में शामिल हुए। हुसैन की आरंभिक शिक्षा मध्यप्रदेश के इंदौर शहर में भी हुई। 1952 में ज्युरिख में उनकी पहली एकल प्रदर्शनी लगी। हुसैन की कला हमेशा ही सीमाओं से परे रहकर अभिव्यक्त हुई और यही वजह है कि उनकी प्रसिद्धि भी देश काल की सीमाओं से ऊपर युरोप और अमेरिका के कैनवास पर अधिक चटख रंगों के साथ उभरीं। 1955 में भारत सरकार ने उनकी कला को पद्मश्री से सम्मानित किया। 
1967 में मकबूल ने एक चित्रकार की नजर से अपनी पहली फिल्म बनाई। इसे बर्लिन फिल्म फेस्टीवल में प्रदर्शित किया गया और फिल्म ने 'गोल्डन बियर' भी जीता। 1973 में हुसैन पद्मभूषण से सम्मानित हुए और 1986 में राज्यसभा के सदस्य मनोनीत किए गए। 1991 में उन्हें पद्मविभूषण से नवाजा गया। 
हुसैन ने दुनिया भर में भारत के सबसे धनाढ्य पेंटर के रूप में अपना वर्चस्व स्थापित किया। हुसैन को कला जगत की 'स्मार्ट' क्रांति कहना अनुचित नहीं होगा। क्योंकि कलाकार इससे पहले तक गरीबी और लाचारी के शिकार होते रहे थे लेकिन 'हुसैन क्रांति' ने दुनिया को संदेश दिया कि अगर स्वयं की पैकेजिंग की कला जानते हैं तो कला भी आजीविका के अतिरिक्त 'शान ओ शौकत' का जरिया बन सकती है। हुसैन की पेंटिंग्स वैश्विक स्तर पर करोड़ों की बोलियों से उठाई जाती रही है। हाल ही में उनकी एक पेंटिंग की बोली 2 मिलीयन डॉलर के लगभग लगी थी। 
फिल्म निर्माण-निर्देशन के क्षेत्र में उनका रूझान हमेशा बना रहा। गजगामिनी जहां उन्होंने माधुरी दीक्षित के रूप से प्रभावित होकर बनाई वहीं मीनाक्षी : ए टेल ऑफ थ्री सीटिज में उनकी प्रिय तारिका तब्बू बनीं। हाल ही में उनकी आत्मकथा पर आधारित फिल्म फ्लोर पर थीं जिसमें श्रेयस तलपड़े यंग हुसैन की भूमिका में हैं। फिल्म का शीर्षक अस्थाई तौर पर 'द मेकिंग ऑफ द पेंटर' है। 
92 वर्ष की अवस्था में मकबूल फिदा हुसैन को केरल सरकार द्वारा अत्यंत प्रतिष्ठित राजा रवि वर्मा अवॉर्ड की घोषणा की गई लेकिन कतिपय विवादों के चलते उन्हें यह अवॉर्ड ‍नहीं दिया जा सका। 
विवादों से अटूट नाता होने के बावजूद हुसैन विश्व कला जगत के सम्माननीय चित्रकार थे। उनका व्यक्तित्व और कला संसार को योगदान अविस्मरणीय रहेगा।
(वेब दुनिया डॉट कॉम, इंदौर की स्मृति जोशी ने मकबूल फ़िदा हुसैन पर एक लेख लिखा था, वही से साभार.)

Sunday, September 13, 2009

कितना जानते हैं आगरा घराने को

शास्त्रीय संगीत के कई घरानों में से एक आगरा घराना अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। इस विरासत को संभालकर रखने वाले अब कुछ लोग ही बचे हैं। 400 साल पुराने इस घराने के आखिरी बड़े प्रतिनिधि उस्ताद अकील अहमद साहब इसी शहर में बेबसी की जिंदगी जी रहे हैं। हालांकि, इस परंपरा को बचाए रखने के लिए वह अभी भी कुछ उभरते गायकों को तालीम देने में जुटे हुए हैं। लेकिन इसके बाद क्या? इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं है।
ललित कला संस्थान में शिक्षक ज्योति खंडेलवाल का कहना है कि लुप्त हो रही इन परंपराओं को संभालने की महती जरूरत है। संगीत की दूसरी धाराओं में महारत हासिल करने के लिए शास्त्रीय संगीत की जानकारी बहुत अहम है।
इप्टा के राष्ट्रीय सचिव जितेंद्र रघुवंशी का मानना है कि आगरा घराने की जमीन न केवल आगरा में बल्कि पूरे देश में है। इस मुगलकालीन संगीत परंपरा को बचाने में कई शास्त्रीय गायक जुटे हुए भी हैं।
आगरा के ही वाशिंदे, उभरते गजल गायक लईक खान कहते हैं कि आगरा घराना अभी खत्म नहीं हुआ है। सारी दुनिया में इसके प्रशंसक फैले हुए हैं। लेकिन, आगरा में इस स्वर्णमयी परंपरा को बचाए रखने का कोई प्रयास नहीं हो रहा है।
"यह केवल आगरा घराना ही है जो अभी भी ध्रुपद-धामर, अलाप, खयाल, ठुमरी, टप्पा, तराना, होरी, दादरा, गजल, रसिया आदि का गायन जारी रखे हुए है", कहना है सांस्कृतिक आलोचक महेश धाकड़ का।
आगरा के दूसरे संगीतकारों ने भी इस जैसी संगीत परंपराओं की खोती चमक पर रोष जताया है। केवल कुछ संस्थान ही इन सांस्कृतिक विरासतों को बचाए रखने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि ललित कला संस्थान में जारी कुछ पाठ्यक्रमों को विद्यार्थियों में रुचि न होने के कारण बंद कर दिया गया।
बृजमंडल हेरिटेज कंजर्वेशन सोसायटी के अध्यक्ष सुरेंद्र शर्मा ने कहा कि "अब समय आ गया है कि आगरा घराना की विरासत को बचाए रखने के लिए ठोस कदम उटाए जाएं"।
(एनडीटीवी से साभार)

Friday, June 20, 2008

भारत में क्षेत्रीय सिनेमा की भूमिका

भारत में क्षेत्रीय सिनेमा की भूमिका
ललित मोहन जोशी
सत्यजीत रे की पथेर पांचाली ने भारत को विश्व सिनेमा में पहचान दिलाईकलात्मक विधा के रूप में भारतीय सिनेमा की पहचान क्या है- बॉलीवुड या क्षेत्रीय सिनेमा ? ग्लोबलाइज़ेशन के मौजूदा दौर में यह सवाल, बॉलीवुड को भारत की प्रतिष्ठा से जोड़ने वाले सिनेप्रेमियों या फिर ऐश्वर्या राय और शाहरुख ख़ान को भारत का राजदूत बताने वाले नेताओं और अफ़सरों को असमंजस में डाल सकता है.सच्चाई ये है कि विश्व सिनेमा के मानचित्र पर भारतीय सिनेमा को स्थापित करने वाली पहली फ़िल्म सत्यजित राय की पथेर पांचाली (1955) थी जो विभूति भूषण बन्धोपाध्याय के कालजयी उपन्यास पर आधारित बंगाली भाषा की एक क्षेत्रीय फ़िल्म है. 1956 के अन्तरर्राष्ट्रीय कान समारोह में, पथेर पांचाली को एक हृदयस्पर्शी ‘मानवीय दस्तावेज़’ की संज्ञा दी गई। बाद में राय की फ़िल्म-त्रयी ( पथेर पांचाली (1955), अपराजितो (1956) और अपूर संसार (1959)) विश्व सिनेमा को भारतीय सिनेमा की देन मानी गई.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान
अडूर गोपालाकृष्णन मलायली सिनेमा के दिग्गज फ़िल्मकार हैंसत्यजित राय के समकालीन रित्विक घटक और मृणाल सेन की कृतियां भी राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुईं हैं.घटक की हर कृति में भारत विभाजन की त्रासदी को उप-कथानक अथवा कथावस्तु की पृष्ठभूमि के रूप में देखा जा सकता है- चाहे वो मेघे ढाका तारा (1960) सुबर्न रेखा (1962), अथवा तिसता एकती नदीर नाम (1973) हो.आज के दौर में गौतम घोष, रितुपर्णो घोष और अपर्णा सेन सक्रिय सिनेकार हैं. श्याम बेनेगल का मानना है कि सत्यजित राय के बाद आज के दौर में भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सिनेकार केरल के अडूर गोपालाकृष्णन हैं जिनकी मुखामुखम (1984), आज़ादी के बाद कम्युनिस्ट पार्टी के अन्तर्विरोध, बिखराव व अस्मिता के संकट को दर्शाती है. अपने पिछले 35 वर्षों के सिनेमाई कैरियर में अडूर ने मात्र 9 फ़िल्में बनाई हैं जो पिछले 60 वर्षों के किसी न किसी पक्ष को रेखांकित करती हैं. केरल के एक अन्य सिनेकार शाजी करुन की पिरवी (1988) ने 70 अन्तरराष्ट्रीय पुरस्कार हासिल किये. लोकप्रियता और व्यावसायिकता की कसौटी पर क्षेत्रीय सिनेमा के मुक़ाबले, मुंबई का हिन्दी सिनेमा (बॉलीवुड) नि:संदेह आगे रहा। पर कथानक, चरित्र विकास और चित्रांकन के नज़रिये से यह कभी भी क्षेत्रीय सिनेमा की गहराई हासिल न कर सका.
मराठी सिनेमा
श्ववास को भारत की ओर से ऑस्कर के लिए नांमाकित किया गया1930 के दशक से ही मराठी सिनेमा ने सामाजिक कुरीतियों, अन्याय और राजनैतिक भ्रष्टाचार के कथानकों पर फ़िल्में बनाईं. व्ही शान्ताराम की कुंकू (1937) और मानूस (1939) नारी मुक्ति और वैश्याओं के उद्धार के कथानकों का निर्वाह ऐसी सिनेमाई शैली में करती हैं जो समय से आगे कही जा सकती हैं और सिनेमाई भाषा के लिहाज़ से किसी भी तरह यूरोपीय सिनेमा से द्वयं न थीं.मराठी सिनेमा में इस समय जब्बार पटेल और अमोल पालेकर जैसे सिद्धहस्थ सिनेकारों के अलावा नई पीढी के संदीप सावंत जैसे सिनेकार हैं जो महत्वपूर्ण फ़िल्में बना रहें हैं।
विचारों का दिवालियापन
1950 के दशक में हिन्दी सिनेमा की अगुआई राजकपूर, बिमल राय, महबूब ख़ान और गुरूदत्त ने की. 1960 के दशक तक हिन्दी सिनेमा के कथानकों में दमखम था.पर धीरे धीरे विचारों का दिवालियापन नज़र आने लगा और हिन्दी सिनेमा मनोरंजन के एक पिटे-पिटाये फ़ार्मूले में बंध गया. 1970 के दशक में नई धारा के श्याम बेनेगल, गोविन्द निहलाणी और सईद अख़्तर मिर्ज़ा सरीखे सिनेकारों उसे उबारने की कोशिश की पर 1980 के दशक के अन्त तक आते-आते ये आन्दोलन बिखर गया. 1990 के दशक में बम्बइया सिनेमा का नया नाम ‘बॉलीवुड’ प्रचलन में आया. भारत के प्रसार माध्यमों में विकसित हो रही ‘बॉलीवुड’ कार्यक्रमों की होड़ ने, धीरे-धीरे क्षेत्रीय सिनेमा की चर्चा को फ़िल्म महोत्सवों तक सीमित कर दिया. आज चौबीस घंटों तक चलने वाले टेलीविज़न चैनलों और समाचार पत्रिकाओं में बॉलिवुड चर्चाओं की भरमार है जबकि क्षेत्रीय सिनेमा पूरी तरह उपेक्षित है. स्वर्ण युग पर बीसवीं सदी के प्रारंभिक दौर से आज तक भारत के कई राज्यों में क्षेत्रीय सिनेमा की जड़े गहरी हुई हैं. 1960 और 1970 के दशक को भारत के क्षेत्रीय सिनेमा का ‘स्वर्ण-युग’ कहा जा सकता है जब बंगाल के बाद केरल, कर्नाटक, असम और उड़ीसा जैसे राज्यों में नई धारा का सिनेमा विकसित हुआ. कन्नडा सिनेमा में गिरीश कारनाड, ब.व.कारंत व गिरीश कासरावल्ली ने अपनी फ़िल्मों से एक नई ‘सांस्कृतिक क्रांति’ पैदा की. एक नाटककार के रूप में तुग़लक़ औऱ हयवदन से ख्याति प्राप्त कारनाड और कारंत ने वंशवृक्ष (1972) के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार अर्जित किया. पर कन्नडा सिनेमा में गिरीश कासरावल्ली की जगह वही है जो केरल में अडूर गोपालाकृष्णन की है.कर्नाटक के एक और सिनेकार गणपति वेंकटरमण अय्यर ने कन्नडा के अतिरिक्त संस्कृत भाषा में आदि शंकराचार्य (1983) और भगवत गीता (1992) बनाई. असम के सर्वाधिक चर्चित सिनेकार जहानू बरुआ की हलोदया चौराये बाओधन खाय (1987) और खगोरोलोये बोहु दूर (1994) जैसी फ़िल्में सामाजिक भ्रष्टाचार, उत्पीड़न और राजनैतिक दुष्चक्र में फंसे विपन्न व निम्न मध्यम वर्ग के जीवन संघर्ष को दर्शाती हैं. उड़िया भाषा के सिनेकार नीरद महापात्र की माया मिरगा (1983) अर्थ-संघर्ष के बीच टूटते-बिखरते एक संयुक्त परिवार की कहानी है।
क्षेत्रीय सिनेमा की उपेक्षा
मीडिया में क्षेत्रीय सिनेमा की तुलना में हिंदी सिनेमा ज़्यादा चर्चा में रहता है21वीं सदी के इस प्रारंभिक दौर में अगर इमानदारी और समग्रता से समूचे भारतीय सिनेमा का जायज़ा लिया जाय तो सरकार और प्रसार माध्यमों की उपेक्षा के बावजूद भारत का क्षेत्रीय सिनेमा न केवल ज़िन्दा रहा है बल्कि उसने नई ज़मीन तो़ड़ने की जद्दोजहद भी जारी रखी है. इसके विपरीत लोकप्रिय हिन्दी सिनेमा अपनी सार्थकता और अस्मिता पूरी तरह खो चुका है.विडम्बना ये है कि वह अपने नाम तक की रक्षा नहीं कर पाया और उसने ‘हॉलीवुड’ की तर्ज़ में ‘बॉलीवुड’ कहलाया जाना स्वीकार कर लिया.क्या ऐसे सिनेमा का अस्तित्व बना रह सकता है ? इस तरह की पलायन वादी फ़िल्मों से भारत के फ़िल्म निर्माता और सिनेकार पर्याप्त विदेशी मुद्रा तो कमा रहे हैं। पर क्या ऐसी फ़िल्में मुख्यधारा के भारतीय सिनेमा को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कोई सम्मान या उंचा मंच प्रदान कर रही हैं ?
साभार: बीबीसी